॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.20.11
हरिता हरिभिः शष्पैरिन्द्रगोपैश्च लोहिता।
उच्छिलीन्ध्रकृतच्छाया नृणां श्रीरिव भूरभूत्॥ ११✎ 1151
haritā haribhiḥ śaṣpairindragopaiśca lohitā|
ucchilīndhrakṛtacchāyā nṛṇāṃ śrīriva bhūrabhūt|| 11
अर्थ
पृथ्वीपर कहीं-कहीं हरी-हरी घासकी हरियाली थी, तो कहीं-कहीं बीरबहूटियोंकी लालिमा और कहीं-कहीं बरसाती छत्तों (सफेद कुकुरमुत्तों) के कारण वह सफेद मालूम देती थी। इस प्रकार उसकी ऐसी शोभा हो रही थी, मानो किसी राजाकी रंग-बिरंगी सेना हो॥ ११॥✎ 1664