नये बरसाती जलके सेवनसे सभी जलचर और थलचर प्राणियोंकी सुन्दरता बढ़ गयी थी, जैसे भगवान्की सेवा करनेसे बाहर और भीतरके दोनों ही रूप सुघड़ हो जाते हैं॥ १३॥✎ 1664
जलस्थलौकसः सर्वे नववारिनिषेवया।
अबिभ्रद् रुचिरं रूपं यथा हरिनिषेवया॥ १३
नये बरसाती जलके सेवनसे सभी जलचर और थलचर प्राणियोंकी सुन्दरता बढ़ गयी थी, जैसे भगवान्की सेवा करनेसे बाहर और भीतरके दोनों ही रूप सुघड़ हो जाते हैं॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.20.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 260) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/20/13/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)