श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.21.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

कृष्णं निरीक्ष्य वनितोत्सवरूपशीलं

श्रुत्वा च तत्क्वणितवेणुविचित्रगीतम्।

देव्यो विमानगतयः स्मरनुन्‍नसारा

भ्रश्यत्प्रसूनकबरा मुमुहुर्विनीव्यः॥ १२

kṛṣṇaṃ nirīkṣya vanitotsavarūpaśīlaṃ

śrutvā ca tatkvaṇitaveṇuvicitragītam|

devyo vimānagatayaḥ smaranunnasārā

bhraśyatprasūnakabarā mumuhurvinīvyaḥ|| 12

अर्थ

अरी सखी! हरिनियोंकी तो बात ही क्या है—स्वर्गकी देवियाँ जब युवतियोंको आनन्दित करनेवाले सौन्दर्य और शीलके खजाने श्रीकृष्णको देखती हैं और बाँसुरीपर उनके द्वारा गाया हुआ मधुर संगीत सुनती हैं, तब उनके चित्र-विचित्र आलाप सुनकर वे अपने विमानपर ही सुध-बुध खो बैठती हैं—मूर्च्छित हो जाती हैं। यह कैसे मालूम हुआ सखी? सुनो तो, जब उनके हृदयमें श्रीकृष्णसे मिलनेकी तीव्र आकांक्षा जग जाती है तब वे अपना धीरज खो बैठती हैं, बेहोश हो जाती हैं। उन्हें इस बातका भी पता नहीं चलता कि उनकी चोटियोंमें गुँथे हुए फूल पृथ्वीपर गिर रहे हैं। यहाँतक कि उन्हें अपनी साड़ीका भी पता नहीं रहता, वह कमरसे खिसककर जमीनपर गिर जाती है॥ १२॥

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