परीक्षित्! वृन्दावनविहारी श्रीकृष्णकी ऐसी-ऐसी एक नहीं, अनेक लीलाएँ हैं। गोपियाँ प्रतिदिन आपसमें उनका वर्णन करतीं और तन्मय हो जातीं। भगवान्की लीलाएँ उनके हृदयमें स्फुरित होने लगतीं॥ २०॥✎ 1666
एवंविधा भगवतो या वृन्दावनचारिणः।
वर्णयन्त्यो मिथो गोप्यः क्रीडास्तन्मयतां ययुः॥ २०
परीक्षित्! वृन्दावनविहारी श्रीकृष्णकी ऐसी-ऐसी एक नहीं, अनेक लीलाएँ हैं। गोपियाँ प्रतिदिन आपसमें उनका वर्णन करतीं और तन्मय हो जातीं। भगवान्की लीलाएँ उनके हृदयमें स्फुरित होने लगतीं॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.21.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 270) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/21/20/