परीक्षित्! यह वंशीध्वनि जड, चेतन—समस्त भूतोंका मन चुरा लेती है। गोपियोंने उसे सुना और सुनकर उसका वर्णन करने लगीं। वर्णन करते-करते वे तन्मय हो गयीं और श्रीकृष्णको पाकर आलिंगन करने लगीं॥ ६॥✎ 884
इति वेणुरवं राजन् सर्वभूतमनोहरम्।
श्रुत्वा व्रजस्त्रियः सर्वा वर्णयन्त्योऽभिरेभिरे॥ ६
परीक्षित्! यह वंशीध्वनि जड, चेतन—समस्त भूतोंका मन चुरा लेती है। गोपियोंने उसे सुना और सुनकर उसका वर्णन करने लगीं। वर्णन करते-करते वे तन्मय हो गयीं और श्रीकृष्णको पाकर आलिंगन करने लगीं॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.21.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 266) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/21/6/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)