श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.22.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

परिधाय स्ववासांसि प्रेष्ठसंगमसज्जिताः।

गृहीतचित्ता नो चेलुस्तस्मिँल्लज्जायितेक्षणाः॥ २३

paridhāya svavāsāṃsi preṣṭhasaṃgamasajjitāḥ|

gṛhītacittā no celustasmim̐llajjāyitekṣaṇāḥ|| 23

अर्थ

परीक्षित्! गोपियोंने अपने-अपने वस्त्र पहन लिये। परन्तु श्रीकृष्णने उनके चित्तको इस प्रकार अपने वशमें कर रखा था कि वे वहाँसे एक पग भी न चल सकीं। अपने प्रियतमके समागमके लिये सजकर वे उन्हींकी ओर लजीली चितवनसे निहारती रहीं॥ २३॥

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