श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.22.26

दशम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

न मय्यावेशितधियां कामः कामाय कल्पते।

भर्जिता क्वथिता धाना प्रायो बीजाय नेष्यते॥ २६

na mayyāveśitadhiyāṃ kāmaḥ kāmāya kalpate|

bharjitā kvathitā dhānā prāyo bījāya neṣyate|| 26

अर्थ

जिन्होंने अपना मन और प्राण मुझे समर्पित कर रखा है उनकी कामनाएँ उन्हें सांसारिक भोगोंकी ओर ले जानेमें समर्थ नहीं होतीं। ठीक वैसे ही, जैसे भुने या उबाले हुए बीज फिर अंकुरके रूपमें उगनेके योग्य नहीं रह जाते॥ २६॥

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