श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.23.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

गृह्णन्ति नो न पतयः पितरौ सुता वा

न भ्रातृबन्धुसुहृदः कुत एव चान्ये।

तस्माद् भवत्प्रपदयोः पतितात्मनां नो

नान्या भवेद् गतिररिन्दम तद् विधेहि॥ ३०

gṛhṇanti no na patayaḥ pitarau sutā vā

na bhrātṛbandhusuhṛdaḥ kuta eva cānye|

tasmād bhavatprapadayoḥ patitātmanāṃ no

nānyā bhaved gatirarindama tad vidhehi|| 30

अर्थ

स्वामी! अब हमारे पति-पुत्र, माता-पिता, भाई-बन्धु और स्वजन-सम्बन्धी हमें स्वीकार नहीं करेंगे; फिर दूसरोंकी तो बात ही क्या है। वीरशिरोमणे! अब हम आपके चरणोंमें आ पड़ी हैं। हमें और किसीका सहारा नहीं है। इसलिये अब हमें दूसरोंकी शरणमें न जाना पड़े, ऐसी व्यवस्था कीजिये॥ ३०॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें