॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.23.30
गृह्णन्ति नो न पतयः पितरौ सुता वा
न भ्रातृबन्धुसुहृदः कुत एव चान्ये।
तस्माद् भवत्प्रपदयोः पतितात्मनां नो
नान्या भवेद् गतिररिन्दम तद् विधेहि॥ ३०
gṛhṇanti no na patayaḥ pitarau sutā vā
na bhrātṛbandhusuhṛdaḥ kuta eva cānye|
tasmād bhavatprapadayoḥ patitātmanāṃ no
nānyā bhaved gatirarindama tad vidhehi|| 30
अर्थ
स्वामी! अब हमारे पति-पुत्र, माता-पिता, भाई-बन्धु और स्वजन-सम्बन्धी हमें स्वीकार नहीं करेंगे; फिर दूसरोंकी तो बात ही क्या है। वीरशिरोमणे! अब हम आपके चरणोंमें आ पड़ी हैं। हमें और किसीका सहारा नहीं है। इसलिये अब हमें दूसरोंकी शरणमें न जाना पड़े, ऐसी व्यवस्था कीजिये॥ ३०॥