श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.23.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

तत्रैका विधृता भर्त्रा भगवन्तं यथाश्रुतम्।

हृदोपगुह्य विजहौ देहं कर्मानुबन्धनम्॥ ३४

tatraikā vidhṛtā bhartrā bhagavantaṃ yathāśrutam|

hṛdopaguhya vijahau dehaṃ karmānubandhanam|| 34

अर्थ

उन स्त्रियोंमेंसे एकको आनेके समय ही उसके पतिने बलपूर्वक रोक लिया था। इसपर उस ब्राह्मणपत्‍नीने भगवान्‌के वैसे ही स्वरूपका ध्यान किया, जैसा कि बहुत दिनोंसे सुन रखा था। जब उसका ध्यान जम गया, तब मन-ही-मन भगवान्‌का आलिंगन करके उसने कर्मके द्वारा बने हुए अपने शरीरको छोड़ दिया—(शुद्धसत्त्वमय दिव्य शरीरसे उसने भगवान्‌की सन्‍निधि प्राप्त कर ली)॥ ३४॥

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