श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.23.44

दशम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

ननु१ स्वार्थविमूढानां प्रमत्तानां गृहेहया।

अहो नः स्मारयामास गोपवाक्यैः सतां गतिः॥ ४४

nanu svārthavimūḍhānāṃ pramattānāṃ gṛhehayā|

aho naḥ smārayāmāsa gopavākyaiḥ satāṃ gatiḥ|| 44

अर्थ

सच्ची बात यह है कि हमलोग गृहस्थीके काम-धंधोंमें मतवाले हो गये थे, अपनी भलाई और बुराईको बिलकुल भूल गये थे। अहो, भगवान्‌की कितनी कृपा है! भक्तवत्सल प्रभुने ग्वालबालोंको भेजकर उनके वचनोंसे हमें चेतावनी दी, अपनी याद दिलायी॥ ४४॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    नूनं।

    (मुद्रित पृष्ठ 287)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें