श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.23.46

दशम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

हित्वान्यान् भजते यं श्रीः पादस्पर्शाशया सकृत्।

आत्मदोषापवर्गेण तद्याच्ञा जनमोहिनी॥ ४६

hitvānyān bhajate yaṃ śrīḥ pādasparśāśayā sakṛt|

ātmadoṣāpavargeṇa tadyācñā janamohinī|| 46

अर्थ

स्वयं लक्ष्मी अन्य सब देवताओंको छोड़कर और अपनी चंचलता, गर्व आदि दोषोंका परित्याग कर केवल एक बार उनके चरणकमलोंका स्पर्श पानेके लिये सेवा करती रहती हैं। वे ही प्रभु किसीसे भोजनकी याचना करें, यह लोगोंको मोहित करनेके लिये नहीं तो और क्या है?॥ ४६॥

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