॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.24.17
देहानुच्चावचाञ्जन्तुः प्राप्योत्सृजति कर्मणा।
शत्रुर्मित्रमुदासीनः कर्मैव गुरुरीश्वरः॥ १७
dehānuccāvacāñjantuḥ prāpyotsṛjati karmaṇā|
śatrurmitramudāsīnaḥ karmaiva gururīśvaraḥ|| 17
अर्थ
जीव अपने कर्मोंके अनुसार उत्तम और अधम शरीरोंको ग्रहण करता और छोड़ता रहता है। अपने कर्मोंके अनुसार ही ‘यह शत्रु है, यह मित्र है, यह उदासीन है’—ऐसा व्यवहार करता है। कहाँतक कहूँ, कर्म ही गुरु है और कर्म ही ईश्वर॥ १७॥