॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.24.5
अस्त्यस्वपरदृष्टीनाममित्रोदास्तविद्विषाम्।
उदासीनोऽरिवद् वर्ज्य आत्मवत् सुहृदुच्यते॥ ५
astyasvaparadṛṣṭīnāmamitrodāstavidviṣām|
udāsīno'rivad varjya ātmavat suhṛducyate|| 5
अर्थ
आप मेरे पिता हैं और मैं आपका पुत्र। ये बातें सुननेके लिये मुझे बड़ी उत्कण्ठा भी है। पिताजी! जो संत पुरुष सबको अपनी आत्मा मानते हैं, जिनकी दृष्टिमें अपने और परायेका भेद नहीं है, जिनका न कोई मित्र है, न शत्रु और न उदासीन—उनके पास छिपानेकी तो कोई बात होती ही नहीं। परन्तु यदि ऐसी स्थिति न हो तो रहस्यकी बात शत्रुकी भाँति उदासीनसे भी नहीं कहनी चाहिये। मित्र तो अपने समान ही कहा गया है, इसलिये उससे कोई बात छिपायी नहीं जाती॥ ४-५॥