श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! व्रजके गोप भगवान् श्रीकृष्णके ऐसे अलौकिक कर्म देखकर बड़े आश्चर्यमें पड़ गये। उन्हें भगवान्की अनन्त शक्तिका तो पता था नहीं, वे इकट्ठे होकर आपसमें इस प्रकार कहने लगे—॥ १॥
एवंविधानि कर्माणि गोपाः कृष्णस्य वीक्ष्य ते।
अतद्वीर्यविदः प्रोचुः समभ्येत्य सुविस्मिताः॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! व्रजके गोप भगवान् श्रीकृष्णके ऐसे अलौकिक कर्म देखकर बड़े आश्चर्यमें पड़ गये। उन्हें भगवान्की अनन्त शक्तिका तो पता था नहीं, वे इकट्ठे होकर आपसमें इस प्रकार कहने लगे—॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.26.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 297) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/26/1/