जब व्रजवासियोंने नन्दबाबाके मुखसे गर्गजीकी यह बात सुनी, तब उनका विस्मय जाता रहा। क्योंकि अब वे अमिततेजस्वी श्रीकृष्णके प्रभावको पूर्णरूपसे देख और सुन चुके थे। आनन्दमें भरकर उन्होंने नन्दबाबा और श्रीकृष्णकी भूरि-भूरि प्रशंसा की॥ २४॥
इति नन्दवचः श्रुत्वा गर्गगीतं व्रजौकसः।
दृष्टश्रुतानुभावास्ते कृष्णस्यामिततेजसः।
मुदिता नन्दमानर्चुः कृष्णं च गतविस्मयाः॥ २४
जब व्रजवासियोंने नन्दबाबाके मुखसे गर्गजीकी यह बात सुनी, तब उनका विस्मय जाता रहा। क्योंकि अब वे अमिततेजस्वी श्रीकृष्णके प्रभावको पूर्णरूपसे देख और सुन चुके थे। आनन्दमें भरकर उन्होंने नन्दबाबा और श्रीकृष्णकी भूरि-भूरि प्रशंसा की॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.26.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 300) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/24/