जिस समय यह केवल तीन महीनेका था और छकड़ेके नीचे सोकर रो रहा था, उस समय रोते-रोते इसने ऐसा पाँव उछाला कि उसकी ठोकरसे वह बड़ा भारी छकड़ा उलटकर गिर ही पड़ा॥ ५॥
हिन्वतोऽधः शयानस्य मास्यस्य चरणावुदक्।
अनोऽपतद् विपर्यस्तं रुदतः प्रपदाहतम्॥ ५
जिस समय यह केवल तीन महीनेका था और छकड़ेके नीचे सोकर रो रहा था, उस समय रोते-रोते इसने ऐसा पाँव उछाला कि उसकी ठोकरसे वह बड़ा भारी छकड़ा उलटकर गिर ही पड़ा॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.26.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 298) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/5/