भगवान्का तिरस्कार करनेके कारण इन्द्र बहुत ही लज्जित थे। इसलिये उन्होंने एकान्त-स्थानमें भगवान्के पास जाकर अपने सूर्यके समान तेजस्वी मुकुटसे उनके चरणोंका स्पर्श किया॥ २॥
विविक्त उपसङ्गम्य व्रीडितः कृतहेलनः।
पस्पर्श पादयोरेनं किरीटेनार्कवर्चसा॥ २
भगवान्का तिरस्कार करनेके कारण इन्द्र बहुत ही लज्जित थे। इसलिये उन्होंने एकान्त-स्थानमें भगवान्के पास जाकर अपने सूर्यके समान तेजस्वी मुकुटसे उनके चरणोंका स्पर्श किया॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.27.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 301) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/2/