श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.27.26

दशम स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

नानारसौघाः सरितो वृक्षा आसन् मधुस्रवाः।

अकृष्टपच्यौषधयो गिरयोऽबिभ्रदुन्मणीन्॥ २६

nānārasaughāḥ sarito vṛkṣā āsan madhusravāḥ|

akṛṣṭapacyauṣadhayo girayo'bibhradunmaṇīn|| 26

अर्थ

नदियोंमें विविध रसोंकी बाढ़ आ गयी। वृक्षोंसे मधुधारा बहने लगी। बिना जोते-बोये पृथ्वीमें अनेकों प्रकारकी ओषधियाँ, अन्‍न पैदा हो गये। पर्वतोंमें छिपे हुए मणि-माणिक्य स्वयं ही बाहर निकल आये॥ २६॥

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