श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.27.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

पिता गुरुस्त्वं जगतामधीशो

दुरत्ययः काल उपात्तदण्डः।

हिताय स्वेच्छातनुभिः समीहसे

मानं विधुन्वञ्जगदीशमानिनाम्॥ ६

pitā gurustvaṃ jagatāmadhīśo

duratyayaḥ kāla upāttadaṇḍaḥ|

hitāya svecchātanubhiḥ samīhase

mānaṃ vidhunvañjagadīśamāninām|| 6

अर्थ

आप जगत‍्के पिता, गुरु और स्वामी हैं। आप जगत‍्का नियन्त्रण करनेके लिये दण्ड धारण किये हुए दुस्तर काल हैं। आप अपने भक्तोंकी लालसा पूर्ण करनेके लिये स्वच्छन्दतासे लीला-शरीर प्रकट करते हैं और जो लोग हमारी तरह अपनेको ईश्‍वर मान बैठते हैं, उनका मान मर्दन करते हुए अनेकों प्रकारकी लीलाएँ करते हैं॥ ६॥

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