श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्यापि सङ्गताः।

जहुर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः॥ ११

tameva paramātmānaṃ jārabuddhyāpi saṅgatāḥ|

jahurguṇamayaṃ dehaṃ sadyaḥ prakṣīṇabandhanāḥ|| 11

अर्थ

परीक्षित्! यद्यपि उनका उस समय श्रीकृष्णके प्रति जारभाव भी था; तथापि कहीं सत्य वस्तु भी भावकी अपेक्षा रखती है? उन्होंने जिनका आलिंगन किया, चाहे किसी भी भावसे किया हो, वे स्वयं परमात्मा ही तो थे। इसलिये उन्होंने पाप और पुण्यरूप कर्मके परिणामसे बने हुए गुणमय शरीरका परित्याग कर दिया। (भगवान्‌की लीलामें सम्मिलित होनेके योग्य दिव्य अप्राकृत शरीर प्राप्त कर लिया।) इस शरीरसे भोगे जानेवाले कर्मबन्धन तो ध्यानके समय ही छिन्‍न-भिन्‍न हो चुके थे॥ ११॥

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