श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

उक्तं पुरस्तादेतत्ते चैद्यः सिद्धिं यथा गतः।

द्विषन्‍नपि हृषीकेशं किमुताधोक्षजप्रियाः॥ १३

uktaṃ purastādetatte caidyaḥ siddhiṃ yathā gataḥ|

dviṣannapi hṛṣīkeśaṃ kimutādhokṣajapriyāḥ|| 13

अर्थ

श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! मैं तुमसे पहले ही कह चुका हूँ कि चेदिराज शिशुपाल भगवान्‌के प्रति द्वेषभाव रखनेपर भी अपने प्राकृत शरीरको छोड़कर अप्राकृत शरीरसे उनका पार्षद हो गया। ऐसी स्थितिमें जो समस्त प्रकृति और उसके गुणोंसे अतीत भगवान् श्रीकृष्णकी प्यारी हैं और उनसे अनन्य प्रेम करती हैं, वे गोपियाँ उन्हें प्राप्त हो जायँ—इसमें कौन-सी आश्‍चर्यकी बात है॥ १३॥✎ 887 888

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #887 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #888 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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