॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.29.15
कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च।
नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते॥ १५
kāmaṃ krodhaṃ bhayaṃ snehamaikyaṃ sauhṛdameva ca|
nityaṃ harau vidadhato yānti tanmayatāṃ hi te|| 15
अर्थ
इसलिये भगवान्से केवल सम्बन्ध हो जाना चाहिये। वह सम्बन्ध चाहे जैसा हो—कामका हो, क्रोधका हो या भयका हो; स्नेह, नातेदारी या सौहार्दका हो। चाहे जिस भावसे भगवान्में नित्य-निरन्तर अपनी वृत्तियाँ जोड़ दी जायँ, वे भगवान्से ही जुड़ती हैं। इसलिये वृत्तियाँ भगवन्मय हो जाती हैं और उस जीवको भगवान्की ही प्राप्ति होती है॥ १५॥✎ 887 888