श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

तदोडुराजः ककुभः करैर्मुखं

प्राच्या विलिम्पन्‍नरुणेन शन्तमैः।

स चर्षणीनामुदगाच्छुचो मृजन्

प्रियः प्रियाया इव दीर्घदर्शनः॥ २

tadoḍurājaḥ kakubhaḥ karairmukhaṃ

prācyā vilimpannaruṇena śantamaiḥ|

sa carṣaṇīnāmudagācchuco mṛjan

priyaḥ priyāyā iva dīrghadarśanaḥ|| 2

अर्थ

भगवान्‌के संकल्प करते ही चन्द्रदेवने प्राची दिशाके मुखमण्डलपर अपने शीतल किरणरूपी करकमलोंसे लालिमाकी रोली-केसर मल दी, जैसे बहुत दिनोंके बाद अपनी प्राणप्रिया पत्‍नीके पास आकर उसके प्रियतम पतिने उसे आनन्दित करनेके लिये ऐसा किया हो! इस प्रकार चन्द्रदेवने उदय होकर न केवल पूर्वदिशाका, प्रत्युत संसारके समस्त चर-अचर प्राणियोंका सन्ताप—जो दिनमें शरत्कालीन प्रखर सूर्य-रश्मियोंके कारण बढ़ गया था—दूर कर दिया॥ २॥✎ 1430

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1430 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): महक → महँक

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें