विषण्णा भग्नसंकल्पाश्चिन्तामापुर्दुरत्ययाम्॥ २८
iti vipriyamākarṇya gopyo govindabhāṣitam|
viṣaṇṇā bhagnasaṃkalpāścintāmāpurduratyayām|| 28
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णका यह अप्रिय भाषण सुनकर गोपियाँ उदास, खिन्न हो गयीं। उनकी आशा टूट गयी। वे चिन्ताके अथाह एवं अपार समुद्रमें डूबने-उतराने लगीं॥ २८॥
इति विप्रियमाकर्ण्य गोप्यो गोविन्दभाषितम्।
विषण्णा भग्नसंकल्पाश्चिन्तामापुर्दुरत्ययाम्॥ २८
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णका यह अप्रिय भाषण सुनकर गोपियाँ उदास, खिन्न हो गयीं। उनकी आशा टूट गयी। वे चिन्ताके अथाह एवं अपार समुद्रमें डूबने-उतराने लगीं॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.29.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 312) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/29/28/