श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.35

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

सिञ्चाङ्ग नस्त्वदधरामृतपूरकेण

हासावलोककलगीतजहृच्छयाग्‍निम्।

नो चेद् वयं विरहजा‌ग्‍न्युपयुक्तदेहा

ध्यानेन याम पदयोः पदवीं सखे ते॥ ३५

siñcāṅga nastvadadharāmṛtapūrakeṇa

hāsāvalokakalagītajahṛcchayāgnim|

no ced vayaṃ virahajāgnyupayuktadehā

dhyānena yāma padayoḥ padavīṃ sakhe te|| 35

अर्थ

प्राणवल्लभ! हमारे प्यारे सखा! तुम्हारी मन्द-मन्द मधुर मुसकान, प्रेमभरी चितवन और मनोहर संगीतने हमारे हृदयमें तुम्हारे प्रेम और मिलनकी आग धधका दी है। उसे तुम अपने अधरोंकी रसधारासे बुझा दो। नहीं तो प्रियतम! हम सच कहती हैं, तुम्हारी विरहव्यथाकी आगसे हम अपने-अपने शरीर जला देंगी और ध्यानके द्वारा तुम्हारे चरणकमलोंको प्राप्त करेंगी॥ ३५॥

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