श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.45

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

नद्याः पुलिनमाविश्य गोपीभिर्हिमवालुकम्।

रेमे तत्तरलानन्दकुमुदामोदवायुना॥ ४५

nadyāḥ pulinamāviśya gopībhirhimavālukam|

reme tattaralānandakumudāmodavāyunā|| 45

अर्थ

इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने गोपियोंके साथ यमुनाजीके पावन पुलिनपर, जो कपूरके समान चमकीली बालूसे जगमगा रहा था, पदार्पण किया। वह यमुनाजीकी तरल तरंगोंके स्पर्शसे शीतल और कुमुदिनीकी सहज सुगन्धसे सुवासित वायुके द्वारा सेवित हो रहा था। उस आनन्दप्रद पुलिनपर भगवान्‌ने गोपियोंके साथ क्रीडा की॥ ४५॥

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