श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.3.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

य आत्मनो दृश्यगुणेषु सन्‍निति

व्यवस्यते स्वव्यतिरेकतोऽबुधः।

विनानुवादं न च तन्मनीषितं

सम्यग् यतस्त्यक्तमुपाददत् पुमान्॥ १८

ya ātmano dṛśyaguṇeṣu sanniti

vyavasyate svavyatirekato'budhaḥ|

vinānuvādaṃ na ca tanmanīṣitaṃ

samyag yatastyaktamupādadat pumān|| 18

अर्थ

जो अपने इन दृश्य गुणोंको अपनेसे पृथक् मानकर सत्य समझता है, वह अज्ञानी है। क्योंकि विचार करनेपर ये देह-गेह आदि पदार्थ वाग्विलासके सिवा और कुछ नहीं सिद्ध होते। विचारके द्वारा जिस वस्तुका अस्तित्व सिद्ध नहीं होता, बल्कि जो बाधित हो जाती है, उसको सत्य माननेवाला पुरुष बुद्धिमान् कैसे हो सकता है?॥ १८॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें