॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.3.18
य आत्मनो दृश्यगुणेषु सन्निति
व्यवस्यते स्वव्यतिरेकतोऽबुधः।
विनानुवादं न च तन्मनीषितं
सम्यग् यतस्त्यक्तमुपाददत् पुमान्॥ १८
ya ātmano dṛśyaguṇeṣu sanniti
vyavasyate svavyatirekato'budhaḥ|
vinānuvādaṃ na ca tanmanīṣitaṃ
samyag yatastyaktamupādadat pumān|| 18
अर्थ
जो अपने इन दृश्य गुणोंको अपनेसे पृथक् मानकर सत्य समझता है, वह अज्ञानी है। क्योंकि विचार करनेपर ये देह-गेह आदि पदार्थ वाग्विलासके सिवा और कुछ नहीं सिद्ध होते। विचारके द्वारा जिस वस्तुका अस्तित्व सिद्ध नहीं होता, बल्कि जो बाधित हो जाती है, उसको सत्य माननेवाला पुरुष बुद्धिमान् कैसे हो सकता है?॥ १८॥