॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.3.25
नष्टे लोके द्विपरार्धावसाने
महाभूतेष्वादिभूतं गतेषु।
व्यक्तेऽव्यक्तं कालवेगेन याते
भवानेकः शिष्यते शेषसंज्ञः॥ २५
naṣṭe loke dviparārdhāvasāne
mahābhūteṣvādibhūtaṃ gateṣu|
vyakte'vyaktaṃ kālavegena yāte
bhavānekaḥ śiṣyate śeṣasaṃjñaḥ|| 25
अर्थ
जिस समय ब्रह्माकी पूरी आयु—दो परार्ध समाप्त हो जाते हैं, काल शक्तिके प्रभावसे सारे लोक नष्ट हो जाते हैं, पंच महाभूत अहंकारमें, अहंकार महत्तत्त्वमें और महत्तत्त्व प्रकृतिमें लीन हो जाता है—उस समय एकमात्र आप ही शेष रह जाते हैं। इसीसे आपका एक नाम ‘शेष’ भी है॥ २५॥