श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.3.41

दशम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

अदृष्ट्वान्यतमं लोके शीलौदार्यगुणैः समम्।

अहं सुतो वामभवं पृश्‍निगर्भ इति श्रुतः॥ ४१

adṛṣṭvānyatamaṃ loke śīlaudāryaguṇaiḥ samam|

ahaṃ suto vāmabhavaṃ pṛśnigarbha iti śrutaḥ|| 41

अर्थ

मैंने देखा कि संसारमें शील-स्वभाव, उदारता तथा अन्य गुणोंमें मेरे-जैसा दूसरा कोई नहीं है; इसलिये मैं ही तुम दोनोंका पुत्र हुआ और उस समय मैं ‘पृश्‍निगर्भ’ के नामसे विख्यात हुआ॥ ४१॥

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