॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.30.11
अप्येणपत्न्युपगतः प्रिययेह गात्रै-
स्तन्वन् दृशां सखि सुनिर्वृतिमच्युतो वः।
कान्ताङ्गसङ्गकुचकुंकुमरंजितायाः
कुन्दस्रजः कुलपतेरिह वाति गन्धः॥ ११
apyeṇapatnyupagataḥ priyayeha gātrai-
stanvan dṛśāṃ sakhi sunirvṛtimacyuto vaḥ|
kāntāṅgasaṅgakucakuṃkumaraṃjitāyāḥ
kundasrajaḥ kulapateriha vāti gandhaḥ|| 11
अर्थ
‘अरी सखी! हरिनियो! हमारे श्यामसुन्दरके अंग-संगसे सुषमा-सौन्दर्यकी धारा बहती रहती है,वे कहीं अपनी प्राणप्रियाके साथ तुम्हारे नयनोंको परमानन्दका दान करते हुए इधरसे ही तो नहीं गये हैं? देखो, देखो; यहाँ कुलपति श्रीकृष्णकी कुन्दकलीकी मालाकी मनोहर गन्ध आ रही है, जो उनकी परम प्रेयसीके अंग-संगसे लगे हुए कुच-कुंकुमसे अनुरंजित रहती है’॥ ११॥