श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.30.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

गत्यानुरागस्मितविभ्रमेक्षितै-

र्मनोरमालापविहारविभ्रमैः ।

आक्षिप्तचित्ताः प्रमदा रमापते-

स्तास्ता विचेष्टा जगृहुस्तदात्मिकाः॥ २

gatyānurāgasmitavibhramekṣitai-

rmanoramālāpavihāravibhramaiḥ |

ākṣiptacittāḥ pramadā ramāpate-

stāstā viceṣṭā jagṛhustadātmikāḥ|| 2

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णकी मदोन्मत्त गजराजकी-सी चाल, प्रेमभरी मुसकान, विलासभरी चितवन, मनोरम प्रेमालाप, भिन्‍न-भिन्‍न प्रकारकी लीलाओं तथा शृंगार-रसकी भाव-भंगियोंने उनके चित्तको चुरा लिया था। वे प्रेमकी मतवाली गोपियाँ श्रीकृष्णमय हो गयीं और फिर श्रीकृष्णकी विभिन्‍न चेष्टाओंका अनुकरण करने लगीं॥ २॥

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