श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.30.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

मा भैष्ट वातवर्षाभ्यां तत्त्राणं विहितं मया।

इत्युक्त्वैकेन हस्तेन यतन्त्युन्‍निदधेऽम्बरम्॥ २०

mā bhaiṣṭa vātavarṣābhyāṃ tattrāṇaṃ vihitaṃ mayā|

ityuktvaikena hastena yatantyunnidadhe'mbaram|| 20

अर्थ

कोई गोपी श्रीकृष्ण बनकर कहती—‘अरे व्रजवासियो! तुम आँधी-पानीसे मत डरो। मैंने उससे बचनेका उपाय निकाल लिया है।’ ऐसा कहकर गोवर्धन-धारणका अनुकरण करती हुई वह अपनी ओढ़नी उठाकर ऊपर तान लेती॥ २०॥✎ 1431

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1431 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): लगी। → लगीं।

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