श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.30.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

धन्या अहो अमी आल्यो गोविन्दाङ् घ्र्यब्जरेणवः।

यान् ब्रह्मेशो रमा देवी दधुर्मूर्ध्‍न्‍यघनुत्तये॥ २९

dhanyā aho amī ālyo govindāṅ ghryabjareṇavaḥ|

yān brahmeśo ramā devī dadhurmūrdhnyaghanuttaye|| 29

अर्थ

प्यारी सखियो! भगवान् श्रीकृष्ण अपने चरणकमलसे जिस रजका स्पर्श कर देते हैं, वह धन्य हो जाती है, उसके अहोभाग्य हैं! क्योंकि ब्रह्मा, शंकर और लक्ष्मी आदि भी अपने अशुभ नष्ट करनेके लिये उस रजको अपने सिरपर धारण करते हैं’॥ २९॥

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