श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.30.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

न लक्ष्यन्ते पदान्यत्र तस्या नूनं तृणांकुरैः।

खिद्यत्सुजाताङ्‌घ्रितलामुन्‍निन्ये प्रेयसीं प्रियः॥ ३१

na lakṣyante padānyatra tasyā nūnaṃ tṛṇāṃkuraiḥ|

khidyatsujātāṅghritalāmunninye preyasīṃ priyaḥ|| 31

अर्थ

यहाँ उस गोपीके पैर नहीं दिखायी देते। मालूम होता है, यहाँ प्यारे श्यामसुन्दरने देखा होगा कि मेरी प्रेयसीके सुकुमार चरणकमलोंमें घासकी नोक गड़ती होगी; इसलिये उन्होंने उसे अपने कंधेपर चढ़ा लिया होगा॥ ३१॥

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