श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.30.36

दशम स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

इत्येवं दर्शयन्त्यस्ताश्‍चेरुर्गोप्यो विचेतसः।

यां गोपीमनयत् कृष्णो विहायान्याः स्त्रियो वने॥ ३६

ityevaṃ darśayantyastāścerurgopyo vicetasaḥ|

yāṃ gopīmanayat kṛṣṇo vihāyānyāḥ striyo vane|| 36

अर्थ

इस प्रकार गोपियाँ मतवाली-सी होकर—अपनी सुधबुध खोकर एक दूसरेको भगवान् श्रीकृष्णके चरणचिह्न दिखलाती हुई वन-वनमें भटक रही थीं। इधर भगवान् श्रीकृष्ण दूसरी गोपियोंको वनमें छोड़कर जिस भाग्यवती गोपीको एकान्तमें ले गये थे, उसने समझा कि ‘मैं ही समस्त गोपियोंमें श्रेष्ठ हूँ। इसीलिये तो हमारे प्यारे श्रीकृष्ण दूसरी गोपियोंको छोड़कर, जो उन्हें इतना चाहती हैं, केवल मेरा ही मान करते हैं। मुझे ही आदर दे रहे हैं॥ ३६-३७॥

यह अर्थ श्लोक 36–37 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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