श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.30.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

कच्चित्तुलसि कल्याणि गोविन्दचरणप्रिये।

सह त्वालिकुलैर्बिभ्रद् दृष्टस्तेऽतिप्रियोऽच्युतः॥ ७

kaccittulasi kalyāṇi govindacaraṇapriye|

saha tvālikulairbibhrad dṛṣṭaste'tipriyo'cyutaḥ|| 7

अर्थ

(अब उन्होंने स्त्रीजातिके पौधोंसे कहा—) ‘बहिन तुलसी! तुम्हारा हृदय तो बड़ा कोमल है, तुम तो सभी लोगोंका कल्याण चाहती हो। भगवान्‌के चरणोंमें तुम्हारा प्रेम तो है ही, वे भी तुमसे बहुत प्यार करते हैं। तभी तो भौंरोंके मँडराते रहनेपर भी वे तुम्हारी माला नहीं उतारते, सर्वदा पहने रहते हैं। क्या तुमने अपने परम प्रियतम श्यामसुन्दरको देखा है?॥ ७॥

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