श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.31.1

दशम स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

अथैकत्रिंशोऽध्यायः

गोपिकागीत

गोप्य ऊचुः

जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः

श्रयत इन्दिरा शश्‍वदत्र हि।

दयित दृश्यतां दिक्षु तावका-

स्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते॥ १

jayati te'dhikaṃ janmanā vrajaḥ

śrayata indirā śaśvadatra hi|

dayita dṛśyatāṃ dikṣu tāvakā-

stvayi dhṛtāsavastvāṃ vicinvate|| 1

अर्थ

गोपियाँ विरहावेशमें गाने लगीं—‘प्यारे! तुम्हारे जन्मके कारण वैकुण्ठ आदि लोकोंसे भी व्रजकी महिमा बढ़ गयी है। तभी तो सौन्दर्य और मृदुलताकी देवी लक्ष्मीजी अपना निवासस्थान वैकुण्ठ छोड़कर यहाँ नित्य-निरन्तर निवास करने लगी हैं, इसकी सेवा करने लगी हैं। परन्तु प्रियतम! देखो तुम्हारी गोपियाँ जिन्होंने तुम्हारे चरणोंमें ही अपने प्राण समर्पित कर रखे हैं, वन-वनमें भटककर तुम्हें ढूँढ़ रही हैं॥ १॥

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