श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.31.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

सुरतवर्धनं शोकनाशनं

स्वरितवेणुना सुष्ठु चुम्बितम्।

इतररागविस्मारणं नृणां ✎ 1156

वितर वीर नस्तेऽधरामृतम्॥ १४

suratavardhanaṃ śokanāśanaṃ

svaritaveṇunā suṣṭhu cumbitam|

itararāgavismāraṇaṃ nṛṇāṃ

vitara vīra naste'dharāmṛtam|| 14

अर्थ

वीरशिरोमणे! तुम्हारा अधरामृत मिलनके सुखको—आकांक्षाको बढ़ानेवाला है। वह विरहजन्य समस्त शोक-सन्तापको नष्ट कर देता है। यह गानेवाली बाँसुरी भलीभाँति उसे चूमती रहती है। जिन्होंने एक बार उसे पी लिया, उन लोगोंको फिर दूसरों और दूसरोंकी आसक्तियोंका स्मरण भी नहीं होता। हमारे वीर! अपना वही अधरामृत हमें वितरण करो, पिलाओ॥ १४॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1156 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नॄणां → नृणां

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें