परीक्षित्! यमुनाजलमें गोपियोंने प्रेमभरी चितवनसे भगवान्की ओर देख-देखकर तथा हँस-हँसकर उनपर इधर-उधरसे जलकी खूब बौछारें डालीं। जल उलीच-उलीचकर उन्हें खूब नहलाया। विमानोंपर चढ़े हुए देवता पुष्पोंकी वर्षा करके उनकी स्तुति करने लगे। इस प्रकार यमुनाजलमें स्वयं आत्माराम भगवान् श्रीकृष्णने गजराजके समान जलविहार किया॥ २४॥✎ 1669
सोऽम्भस्यलं युवतिभिः परिषिच्यमानः
प्रेम्णेक्षितः प्रहसतीभिरितस्ततोऽङ्ग।
वैमानिकैः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानो
रेमे स्वयं स्वरतिरत्र गजेन्द्रलीलः॥ २४
परीक्षित्! यमुनाजलमें गोपियोंने प्रेमभरी चितवनसे भगवान्की ओर देख-देखकर तथा हँस-हँसकर उनपर इधर-उधरसे जलकी खूब बौछारें डालीं। जल उलीच-उलीचकर उन्हें खूब नहलाया। विमानोंपर चढ़े हुए देवता पुष्पोंकी वर्षा करके उनकी स्तुति करने लगे। इस प्रकार यमुनाजलमें स्वयं आत्माराम भगवान् श्रीकृष्णने गजराजके समान जलविहार किया॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.33.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 335) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/33/24/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)