श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.33.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

किमुताखिलसत्त्वानां तिर्यङ्मर्त्यदिवौकसाम्।

ईशितुश्‍चेशितव्यानां कुशलाकुशलान्वयः॥ ३४

kimutākhilasattvānāṃ tiryaṅmartyadivaukasām|

īśituśceśitavyānāṃ kuśalākuśalānvayaḥ|| 34

अर्थ

जब उन्हींके सम्बन्धमें ऐसी बात है तब जो पशु, पक्षी, मनुष्य, देवता आदि समस्त चराचर जीवोंके एकमात्र प्रभु सर्वेश्‍वर भगवान् हैं, उनके साथ मानवीय शुभ और अशुभका सम्बन्ध कैसे जोड़ा जा सकता है॥ ३४॥

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