श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.33.38

दशम स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

नासूयन् खलु कृष्णाय मोहितास्तस्य मायया।

मन्यमानाः स्वपार्श्‍वस्थान् स्वान् स्वान् दारान् व्रजौकसः॥ ३८

nāsūyan khalu kṛṣṇāya mohitāstasya māyayā|

manyamānāḥ svapārśvasthān svān svān dārān vrajaukasaḥ|| 38

अर्थ

व्रजवासी गोपोंने भगवान् श्रीकृष्णमें तनिक भी दोषबुद्धि नहीं की। वे उनकी योगमायासे मोहित होकर ऐसा समझ रहे थे कि हमारी पत्‍नियाँ हमारे पास ही हैं॥ ३८॥

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