गोपियोंका जीवन भगवान्की रति है, प्रेम है। वे श्रीकृष्णसे सटकर नाचते-नाचते ऊँचे स्वरसे मधुर गान कर रही थीं। श्रीकृष्णका संस्पर्श पा-पाकर और भी आनन्दमग्न हो रही थीं। उनके राग-रागिनियोंसे पूर्ण गानसे यह सारा जगत् अब भी गूँज रहा है॥ ९॥✎ 2090
उच्चैर्जगुर्नृत्यमाना रक्तकण्ठ्यो रतिप्रियाः।
कृष्णाभिमर्शमुदिता यद्गीतेनेदमावृतम्॥ ९
गोपियोंका जीवन भगवान्की रति है, प्रेम है। वे श्रीकृष्णसे सटकर नाचते-नाचते ऊँचे स्वरसे मधुर गान कर रही थीं। श्रीकृष्णका संस्पर्श पा-पाकर और भी आनन्दमग्न हो रही थीं। उनके राग-रागिनियोंसे पूर्ण गानसे यह सारा जगत् अब भी गूँज रहा है॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.33.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 332) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/9/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)