श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.33.9

दशम स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

उच्चैर्जगुर्नृत्यमाना रक्तकण्ठ्यो रतिप्रियाः।

कृष्णाभिमर्शमुदिता यद्गीतेनेदमावृतम्॥ ९

uccairjagurnṛtyamānā raktakaṇṭhyo ratipriyāḥ|

kṛṣṇābhimarśamuditā yadgītenedamāvṛtam|| 9

अर्थ

गोपियोंका जीवन भगवान्‌की रति है, प्रेम है। वे श्रीकृष्णसे सटकर नाचते-नाचते ऊँचे स्वरसे मधुर गान कर रही थीं। श्रीकृष्णका संस्पर्श पा-पाकर और भी आनन्दम‌ग्‍न हो रही थीं। उनके राग-रागिनियोंसे पूर्ण गानसे यह सारा जगत् अब भी गूँज रहा है॥ ९॥✎ 2090

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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