श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.34.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 34 · अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः

मा भैष्टेत्यभयारावौ शालहस्तौ तरस्विनौ।

आसेदतुस्तं तरसा त्वरितं गुह्यकाधमम्॥ २८

mā bhaiṣṭetyabhayārāvau śālahastau tarasvinau|

āsedatustaṃ tarasā tvaritaṃ guhyakādhamam|| 28

अर्थ

‘डरो मत, डरो मत’ इस प्रकार अभयवाणी कहते हुए हाथमें शालका वृक्ष लेकर बड़े वेगसे क्षणभरमें ही उस नीच यक्षके पास पहुँच गये॥ २८॥

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