‘डरो मत, डरो मत’ इस प्रकार अभयवाणी कहते हुए हाथमें शालका वृक्ष लेकर बड़े वेगसे क्षणभरमें ही उस नीच यक्षके पास पहुँच गये॥ २८॥
मा भैष्टेत्यभयारावौ शालहस्तौ तरस्विनौ।
आसेदतुस्तं तरसा त्वरितं गुह्यकाधमम्॥ २८
‘डरो मत, डरो मत’ इस प्रकार अभयवाणी कहते हुए हाथमें शालका वृक्ष लेकर बड़े वेगसे क्षणभरमें ही उस नीच यक्षके पास पहुँच गये॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.34.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 350) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/34/28/