श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.34.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 34 · अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः

अविदूर इवाभ्येत्य शिरस्तस्य दुरात्मनः।

जहार मुष्टिनैवाङ्ग सहचूडामणिं विभुः॥ ३१

avidūra ivābhyetya śirastasya durātmanaḥ|

jahāra muṣṭinaivāṅga sahacūḍāmaṇiṃ vibhuḥ|| 31

अर्थ

कुछ ही दूर जानेपर भगवान्‌ने उसे पकड़ लिया और उस दुष्टके सिरपर कसकर एक घूँसा जमाया और चूड़ामणिके साथ उसका सिर भी धड़से अलग कर दिया॥ ३१॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें