श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.35.1

दशम स्कन्ध · अध्याय 35 · अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः

अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः

युगलगीत

श्रीशुक उवाच

गोप्यः कृष्णे वनं याते तमनुद्रुतचेतसः।

कृष्णलीलाः प्रगायन्त्यो निन्युर्दुःखेन वासरान्॥ १

gopyaḥ kṛṣṇe vanaṃ yāte tamanudrutacetasaḥ|

kṛṣṇalīlāḥ pragāyantyo ninyurduḥkhena vāsarān|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके गौओंको चरानेके लिये प्रतिदिन वनमें चले जानेपर उनके साथ गोपियोंका चित्त भी चला जाता था। उनका मन श्रीकृष्णका चिन्तन करता रहता और वे वाणीसे उनकी लीलाओंका गान करती रहतीं। इस प्रकार वे बड़ी कठिनाईसे अपना दिन बितातीं॥ १॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें