श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.35.26

दशम स्कन्ध · अध्याय 35 · अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एवं व्रजस्त्रियो राजन् कृष्णलीला नु गायतीः।

रेमिरेऽहःसु तच्चित्तास्तन्मनस्का महोदयाः॥ २६

evaṃ vrajastriyo rājan kṛṣṇalīlā nu gāyatīḥ|

remire'haḥsu taccittāstanmanaskā mahodayāḥ|| 26

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! बड़भागिनी गोपियोंका मन श्रीकृष्णमें ही लगा रहता था। वे श्रीकृष्णमय हो गयी थीं। जब भगवान् श्रीकृष्ण दिनमें गौओंको चरानेके लिये वनमें चले जाते, तब वे उन्हींका चिन्तन करती रहतीं और अपनी-अपनी सखियोंके साथ अलग-अलग उन्हींकी लीलाओंका गान करके उसीमें रम जातीं। इस प्रकार उनके दिन बीत जाते॥ २६॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे वृन्दावनक्रीडायां
गोपिकायुगलगीतं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः॥ ३५॥

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