श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.36.38

दशम स्कन्ध · अध्याय 36 · अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः

अक्रूर उवाच

राजन् मनीषितं सम्यक् तव स्वावद्यमार्जनम्।

सिद्ध्यसिद्ध्योः समं कुर्याद् दैवं हि फलसाधनम्॥ ३८

rājan manīṣitaṃ samyak tava svāvadyamārjanam|

siddhyasiddhyoḥ samaṃ kuryād daivaṃ hi phalasādhanam|| 38

अर्थ

अक्रूरजीने कहा—महाराज! आप अपनी मृत्यु, अपना अरिष्ट दूर करना चाहते हैं, इसलिये आपका ऐसा सोचना ठीक ही है। मनुष्यको चाहिये कि चाहे सफलता हो या असफलता, दोनोंके प्रति समभाव रखकर अपना काम करता जाय। फल तो प्रयत्‍नसे नहीं, दैवी प्रेरणासे मिलते हैं॥ ३८॥

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