श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्के परमप्रेमी भक्त देवर्षि नारदजीने इस प्रकार भगवान्की स्तुति और प्रणाम किया। भगवान्के दर्शनोंके आह्लादसे नारदजीका रोम-रोम खिल उठा। तदनन्तर उनकी आज्ञा प्राप्त करके वे चले गये॥ २५॥
एवं यदुपतिं कृष्णं भागवतप्रवरो मुनिः।
प्रणिपत्याभ्यनुज्ञातो ययौ तद्दर्शनोत्सवः॥ २५
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्के परमप्रेमी भक्त देवर्षि नारदजीने इस प्रकार भगवान्की स्तुति और प्रणाम किया। भगवान्के दर्शनोंके आह्लादसे नारदजीका रोम-रोम खिल उठा। तदनन्तर उनकी आज्ञा प्राप्त करके वे चले गये॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.37.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 365) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/37/25/