॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.37.8
समेधमानेन स कृष्णबाहुना ✎ 1163
निरुद्धवायुश्चरणांश्च विक्षिपन्।
प्रस्विन्नगात्रः परिवृत्तलोचनः
पपात लेण्डं विसृजन् क्षितौ व्यसुः॥ ८
samedhamānena sa kṛṣṇabāhunā
niruddhavāyuścaraṇāṃśca vikṣipan|
prasvinnagātraḥ parivṛttalocanaḥ
papāta leṇḍaṃ visṛjan kṣitau vyasuḥ|| 8
अर्थ
अचिन्त्यशक्ति भगवान् श्रीकृष्णका हाथ उसके मुँहमें इतना बढ़ गया कि उसकी साँसके भी आने-जानेका मार्ग न रहा। अब तो दम घुटनेके कारण वह पैर पीटने लगा। उसका शरीर पसीनेसे लथपथ हो गया, आँखोंकी पुतली उलट गयी, वह मल-त्याग करने लगा। थोड़ी ही देरमें उसका शरीर निश्चेष्ट होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा तथा उसके प्राण-पखेरू उड़ गये॥ ८॥