॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.38.13
स चावतीर्णः किल सात्वतान्वये
स्वसेतुपालामरवर्यशर्मकृत् ।
यशो वितन्वन् व्रज आस्त ईश्वरो
गायन्ति देवा यदशेषमङ्गलम्॥ १३
sa cāvatīrṇaḥ kila sātvatānvaye
svasetupālāmaravaryaśarmakṛt |
yaśo vitanvan vraja āsta īśvaro
gāyanti devā yadaśeṣamaṅgalam|| 13
अर्थ
जिनके गुणगानका ही ऐसा माहात्म्य है, वे ही भगवान् स्वयं यदुवंशमें अवतीर्ण हुए हैं। किसलिये? अपनी ही बनायी मर्यादाका पालन करनेवाले श्रेष्ठ देवताओंका कल्याण करनेके लिये। वे ही परम ऐश्वर्यशाली भगवान् आज व्रजमें निवास कर रहे हैं और वहींसे अपने यशका विस्तार कर रहे हैं उनका यश कितना पवित्र है! अहो, देवतालोग भी उस सम्पूर्ण मंगलमय यशका गान करते रहते हैं॥ १३॥✎ 1920